मंगलवार, 7 जनवरी 2014

" आम आदमी पार्टी " पर मीडिया की मेहरबानी !!

पिछले कुछ समय से व्यस्तता के चलते ब्लोगिंग को समय नहीं दे पाया और यह व्यस्तता अभी कुछ दिन और बनी रहेगी ! इसी व्यस्तता के बीच दिल्ली में "आप" की सरकार बन गयी लेकिन दिल्ली में जब से आप पार्टी की सरकार बनी है तब से मीडिया द्वारा आप पार्टी के समर्थन में बिरदावलीयों का दौर अनवरत जारी है ! वैसे में इसको मीडिया की नासमझी नहीं कहूँगा क्योंकि अन्ना आंदोलन से लेकर दिल्ली चुनावों तक सब कुछ मेरी नजर में है जहाँ हर जगह मीडिया ने अपनी परोक्ष भूमिका अदा की है ! वो अन्ना आंदोलन की अनवरत कवरेज हो या फिर राजनैतिक पार्टी के गठन को समर्थन देना और दिल्ली विधानसभा चुनावों में प्रचारक की भूमिका निभाना शामिल है !!

वर्तमान में मीडिया बिरदावलीयों को किनारे कर दें और हकीकत का सामना करें तो मुझे आम आदमी पार्टी की दिल्ली में जीत पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ ! जिसका कारण स्पष्ट है क्योंकि आम आदमी पार्टी का सकारात्मक चुनाव प्रचार खुद मीडिया कर रहा था और जिसमें मीडिया खुद सक्रिय भूमिका निभाता है उसका असर तात्कालिक तौर पर जरुर पड़ता है ! जिसका उदाहारण हम अन्ना आंदोलन , दामिनी कांड से लेकर दिल्ली में आम् आदमी पार्टी की जीत तक देख ही चुके हैं ! इसलिए ये आम आदमी पार्टी की जीत कम और मीडिया की भूमिका की जीत ज्यादा मानी जानी चाहिए !!

शनिवार, 19 अक्टूबर 2013

कालेधन पर मोदी का सवाल और कांग्रेस का जबाब !!

कल बेंगलुरु से नरेंद्र मोदी ने सरकार द्वारा सपनें के आधार पर खजाने की खुदाई करवाने को आधार बनाकर सरकार पर निशाना साधा और उसके बाद जो कांग्रेस का जबाब आया वो वाकई हास्यास्पद ही कहा जाएगा ! मोदी नें कहा था कि सरकार एक आदमी के सपनें को आधार बनाकर खुदाई करवा रही है लेकिन इससे कई गुना ज्यादा खजाना तो स्विस बैंकों में जमा है जिसको लानें में सरकार की दिलचस्पी क्यों नहीं दिखा रही है ! उनका कहना सत्य भी है क्योंकि यह खजाना तो ३००० करोड का ही है जबकि कालाधन लाखों करोड का है !

जिसके जबाब में कांग्रेस प्रवक्ता रेणुका चौधरी यह कहना कि "कालेधन को लेकर नरेंद्र मोदी के पास अगर जानकारियाँ है तो वो सरकार को देनी चाहिए ! सरकार उन पर भी कारवाई करेगी " उनको ही हंसी का पात्र बना दिया है और कांग्रेस की वो मंशा भी साफ़ हो गयी जो कालेधन को लेकर पहले भी कई बार जाहिर हो चुकी है ! वैसे रेणुका जी किन जानकारियों की बात कर रही है यह तो उनको बताना ही चाहिए ! तत्कालीन वितमंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा कालेधन पर स्वेत पत्र लाया जा चूका है क्या उसका कोई महत्व कांग्रेस की नजर में है भी या नहीं ! वैसे भी उसमें कई बातों को गौण कर दिया गया था लेकिन जितनी जानकारियाँ उसमें थी उनके आधार पर कोई कारवाई क्यों नहीं हुयी !

कालेधन का मामला ऐसा तो है नहीं कि यह पहली बार मोदी नें ही उठाया है ! बाबा रामदेव इस मुद्दे पर लगातार २००४ से संघर्षरत है और कई बड़े बड़े आंदोलन सरकार की नाक के निचे दिल्ली में आयोजित कर चुके हैं ! देश भर में घूम घूम कर जनता को बता चुके हैं ! २७ फरवरी २०११ और ४ जून २०११ को दिल्ली में बड़े आंदोलनों को अंजाम दे चुके हैं जिसमें ४ जून वाले आंदोलन पर तो पुलिसिया कारवाई भी हुयी थी ! यह सब कांग्रेस को याद है कि नहीं और क्या उसको यह भी याद नहीं कि उसके चार चार मंत्री इसी कालेधन के मुद्दे पर बाबा रामदेव से बात करनें हवाईअड्डे तक गए थे ! फिर सरकार क्यों सोती रही क्यों नहीं कालेधन वाले मामले पर सरकार गंभीर दिखाई दी !

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

सपनों के सच होने पर क्या यकीन किया जा सकता है !!

साधू को स्वपन में खजाना दिखने और उसके बाद खुदाई चालु करने के कारण उन्नाव जिले का डोडिया खेड़ा गाँव अचानक मीडिया में चर्चित हो गया !  लेकिन क्या स्वपन में दिखाई देने वाली बातें सच भी हो सकती है इसको लेकर एक नयी बहस जरुर छिड गयी ! हालांकि स्वपनों को लेकर हमेशा से विरोधाभासी रुख ही रहा है और कुछ लोग जहां स्वपनों की सत्यता को सिरे से नकारते रहे हैं वही ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो स्वप्नों की सत्यता पर शतप्रतिशत सहमत नहीं है लेकिन एकदम से नकारते भी नहीं है ! 

स्वपन शरीर की शिथिल अवस्था में जागृत और अवचेतन मन के बीच होने वाले संकेतों के आदान प्रदान के दौरान उत्पन होनें वाली घटनाएं होती है ! जिनको कई लोग भविष्य का संकेतक भी मानते हैं लेकिन स्वपन सदैव सत्य हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता और सदैव असत्य हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता ! हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी स्वप्नों की सत्यता को लेकर अनेकानेक तथ्य सामने आते हैं ! रामायण में भी एक प्रसंग आता है जो उस समय का है जब भारत जी राजा दशरथ के देवप्रयाण के बाद रामजी को लिवाने जाते हैं ! उनके वहाँ पहुँचने से पहले सीताजी सपने का जिक्र करती है जिसमें माँ सीता व्याकुल होकर भगवान श्रीराम जी से कहती है कि मैनें आज स्वपन में देखा है कि भरतजी राज समाज सहित आये हैं और जो दृश्य मैनें देखा है उससे मेरा मन व्याकुलता से भर गया है ! 

रामायण में ऐसे कई तथ्य स्वपनों को लेकर आये हैं जो स्वप्नों की सत्यता की पुष्टि करते हैं ! मत्स्यपुराण भी स्वपनों को भविष्य का संकेत मानता है ! वर्तमान में भी स्वपनों को लेकर कई घटनाएं हमारे आस पास ऐसी घटित होती है जो स्वपनों की सत्यता की धारणा को बल प्रदान करती है ! हालांकि उनाव में खजाने को लेकर जिस स्वपन का जिक्र किया जा रहा है उसकी सत्यता की पुष्टि होना अभी बाकी है लेकिन देर सवेर सच सामने आ ही जाएगा ! जहां तक मेरा मानना है स्वपन में खजाने को लेकर संकेत तो मिल सकता है लेकिन इतना सटीक संकेत स्वपन में मिल सकता है इस पर सहसा विश्वास नहीं होता ! जबकि स्वपन देखने वाले साधू का कहना कि वहाँ एक हजार टन सोना है शक भी पैदा करता है ! 

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

जानलेवा लापरवाहियों को कब तक लीपापोती में छिपाते रहेंगे !!

आखिर कब तक जानलेवा लापरवाहियों को सहन करते रहेंगे और इन प्रशासनिक  लापरवाहियों के कारण लोग अपनीं जानें गंवाते रहेंगे ! हमारे देश में साल-दरसाल धार्मिक स्थानों पर हादसे होते रहते हैं लेकिन ऐसा लगता प्रशासनिक तंत्र उनसे सबक लेना ही नहीं चाहता है ! ऐसा नहीं है कि इन स्थानों पर आनें वाले श्रदालुओं के बारे में प्रशासन को पहले से पता नहीं रहता हो लेकिन फिर भी प्रशासन इन हादसों को रोक पानें में नाकाम रहता है ! विडम्बना देखिये राज्य बदलते रहते हैं लेकिन हादसों के घटने का तरीका एक सा ही रहता है फिर भी प्रशासन सबक नहीं लेता है ! 

आजादी के बाद से अब तक हजारों लोगों की जानें धार्मिक स्थानों पर भगदड़ मचने की वजह से चली गयी और प्रशासन इस तरह के हादसों को रोकने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था बना पानें में नाकाम रहा है ! और कई मामलों में तो भगदड़ के लिए पुलिस के द्वारा किया जाने वाला लाठीचार्ज ही जिम्मेदार रहा है ! अभी हाल ही में हुए नवमी पर दतिया के रतनगढ़ माता मंदिर और कुम्भ मेले के समय इलाहबाद रेलवे प्लेटफोर्म पर हुए हादसे तो पुलिस लाठीचार्ज के कारण ही हुए ! भले ही पुलिस अपनीं नाकामी अफवाहों पर डालकर बचने की कोशिश करे ! धार्मिक स्थानों पर आनें वाली श्रदालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन पहले से कोई व्यवस्था बना पाने में नाकाम रहता है और जब भीड़ हद से ज्यादा हो जाती है तो लाठीचार्ज का सहारा लिया जाता है जो ऐसे हादसों को जन्म देता है !

इन हादसों से सबक लेनें की बजाय प्रशासन और सरकारों द्वारा लीपापोती शुरू हो जाती है ! मुख्यमंत्री सारा दोष प्रशासनिक अमले पर डालकर बरी होना चाहता है और प्रशासनिक अधिकारी दोष श्रदालुओं पर डालकर बरी होना चाहते हैं ! राज्य में प्रशासनिक लापरवाही से होने वाली हर घटना की नैतिक जिम्मेदारी तो मुख्यमंत्री की बनती ही है ! भला यह कैसे चल सकता है कि प्रशासन द्वारा कोई भी अच्छा काम हो तो उसका श्रेय लेनें के लिए तो मुख्यमंत्री आगे आ जाते हैं लेकिन बुरे कामों के लिए प्रशासन पर दोष डालकर खुद किनारे होनें की कोशिश करते हैं और यह केवल एक राज्य अथवा एक मुख्यमंत्री की कहानी नहीं है बल्कि हर राज्य और हर मुख्यमंत्री की यही कहानी है और शिवराज सिंह चौहान भी इससे अलग नहीं है !

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

एक समान शिक्षा निति क्यों नहीं लागू हो सकती !

हमारी सरकारें शिक्षा के नाम पर तमाम दावे करती है लेकिन उन दावों में कोई सच्चाई नजर नहीं आती है ! भारत में तक़रीबन साढे छ: लाख गाँव है और गाँवों में चल रहे सरकारी विद्यालयों में जाकर देखेंगे तो आपको सरकारी दावों की सच्चाई का पता चल जाएगा ! उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मिल रही शिक्षा देखेंगे तो आप सोचने पर विवश हो जायेंगे ! किसी दिन किसी भी गाँव के सरकारी विद्यालय का भ्रमण कर लीजिए ! आधी स्थति तो आपके सामनें विधालय में घुसते ही आ जायेगी और बाकी आधी आप उस विद्यालय के शिक्षकों से बात करेंगे तो सामने आ जायेगी !

सरकारी विधालयों को सरकारी घोषणाओं के आधार पर कर्म्मोनत तो कर दिया जाता है लेकिन अध्यापकों के नाम पर आज भी हर विद्यालय में शिक्षकों की कमी है ! और यह कोई दो चार साल से नहीं हो रहा है बल्कि पिछले दो दशक से यही हो रहा है और उसमें भी पिछले एक दशक में तो यह ज्यादा ही हुआ है ! कमी के बावजूद शिक्षकों पर हर वो काम थोपा गया जिसका असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ना तय था ! वोट करवाना , जनगणना करवानी , गाँवों में पशुओं की गिनती , पोलियो की दवा पिलाने ,मिड डे मिल जैसे तमाम काम कमी के बावजूद शिक्षकों के जिम्मे डाल दिए ! जिसका परिणाम जो होना था वही हुआ और शिक्षा का व्यापार शुरू हो गया और इसके पीछे सरकारों की नीतियां जिम्मेदार रही !

इन सब बातों का प्रभाव उन विद्यालयों में पढनें वाले छात्रों की शिक्षा पर पड़ना स्वाभाविक ही था ! जिसका परिणाम यह हुआ कि जो अभिभावक अपनें बच्चों को निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ा सकते थे उन्होंने अपनें बच्चों को निजी शिक्षण संस्थानों में पढ़ाना शुरू कर दिया ! इनमें वो अभिभावक भी थे जो सक्षम थे और वो भी जिन्हें अपनें बच्चो के भविष्य की चिंता थी लेकिन खर्च उठाने में सक्षम नहीं थे लेकिन फिर भी अपना पेट काटकर भी उन्होंने अपनें बच्चो के भविष्य के लिए ये कदम उठाना पड़ा ! और जो लोग इसमें भी सक्षम नहीं थे उनके बच्चे आज भी इन्ही सरकारी विधालयों में पढ़ रहे हैं ! और उनके उज्जवल भविष्य की दुआ करनें के सिवा कोई क्या उम्मीद कर सकता है !